Chapter - 3 ऐतिहासिक स्रोतों के प्रकार

 ऐतिहासिक स्रोतों के प्रकार 

ऐतिहासिक स्रोतों के प्रकार 

भौतिक - 

पत्थर के मंदिर जैसे दक्षिण भारत में, 

ईंटों के विहार पूर्वी भारत , 

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धरती पर टीला - इसमें विभिन्न संस्कृतियों का कालक्रम  के अनुसार विवरण मिल जाता है।  टीलों की खुदाई दो तरह से होती है अनुलम्ब और क्षैतिज। क्षैतिज खुदाई अधिक खर्चीली होती है इसलिए कम की गयी हैं।  

अनुलम्ब खुदाई में सीधे लंबवत निचे की और खोदा जाता है जिससे विभिन्न संस्कृतियों का कालक्रम का पता चलता है। 

उत्खनन से भौतिक जीवन का सही चित्र नहीं मिल पता।  क्योंकि जो पुरावशेष मिलते हैं वो उसी अनुपात में सुरक्षित नहीं होते।  जैसे पचिमी भारत में सुखी जलवायु के कारन पुरावशेष सुरक्षित मिल जाते हैं लेकिन जहाँ नाम और आर्द्र जलवायु है जैसे पूर्वी भारत में तो वहां पर अवशेष उतने सुरक्षित नहीं हैं 


पुरातत्व - एक ऐसा विज्ञान है जिसमें पुराने टीले का क्रमिक ढंग से उत्खनन किया जाता है जिससे प्राचीन काल के लोगों के भौतिक जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।  

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सिक्के - सिक्कों का अध्ययन मुद्राशास्त्र (न्यूमिस्मेटिक।  प्राचीन काल में कागजी मुद्रा का प्रचलन नहीं था धातु मुद्रा और अन्य मुद्रा प्रयोग में लायी जाती थीं। बैंकिंग प्रणाली नहीं थी लोग मिटटी के बर्तन या कांसे के बर्तन में मुद्राएं रखते थे। आप यदि प्राचीन सिक्कों के देखना चाहते हैं तो भारत के विभिन्न संग्रहालयों में देख सकते हैं। 

आरंभिक सिक्के में प्रतीक मिलते हैं लेकिन बाद के समय में राजाओं और देवताओं तथा तिथियों का वर्णन भी सिक्कों में होने लगा।  सिक्कों की किसी स्थान में प्रचुर मात्रा यह संकेत देती है की इन सिक्कों का यहाँ पर प्रचलन था। 

सिक्कों का उपयोग दान दक्षिणा, खरीद बिक्री , वेतन और मजदूरी के भुगतान में किया जाता था। इससे सिक्कों से  आर्थिक इतिहास की जानकारी मिलती ह। 

राजाओं की अनुमति से कुछ व्यापारी और स्वर्णकारों की श्रेणियों ने अपने सिक्के भी जारी किये इससे उनके व्यापर की उन्नति का पता चलता है। 

सिक्कों के कारण लेन देन की प्रक्रिया आसान हुयी और इससे व्यापर की भी बढ़ावा मिला। 

विभिन्न कालखंड में सिक्कों की उपलब्धता से यह प्रतीत होता है की उस समय व्यापारिक गतिविधियां कैसी थीं।  

फैक्ट - सबसे अधिक सोने के सिक्के गुप्त काल में जारी किये गए। 

सिक्कों पर राजवंशों और देवताओं के चित्र धार्मिक प्रतीक और लेख भी रहते हैं जो उस काल के कला और धर्म पर प्रकाश डालते हैं। 

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अभिलेख 

पुरालेखाशास्त्र (एपिग्राफी) - अभिलेखों का अध्ययन 

अभिलेख सिक्कों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं ये अभिलेख मुहरों में प्रस्तरस्तम्भों में मंदिर की दीवारों में स्तूपों पर ईटों एवं मूर्तियों पर मिलते हैं। 

भारत में मिले प्रारंभिक अभिलेख पत्थर पर खुदे मिलते हैं और बाद के काल में ताम्र पत्रों का भी प्रयोग होने लगा। 

पत्थर में अभिलेख लिखने की परिपाटी दक्षिण भारत में ज्यादा चल रही थी। तथा मंदिर की दीवारों पर भी भरी संख्या में अभिलेख लिखे गए। 

आरम्भिक अभिलेख प्राकृत भाषा में लिखे गए थे लेकिन ईसा की दूसरी सदी से संस्कृत का भी प्रयोग होने लगा। फिर नौवीं दसवीं सदी से तो प्रादेशिक भाषाओँ का प्रयोग होने लगा। 

हड़प्पा संस्कृति के अभिलेख पढ़े नहीं जा सके क्योंकि उनकी लिपि भावचित्रात्मक थी जिसमें विचारों और वस्तुओं को चित्र के रूप में दर्शाया जाता था। 

अशोक के शिलालेख ब्राम्ही लिपि में हैं जो बांयें से दाएं और लिखी जाती है। 

गुप्त काल के अंत तक देश की प्रमुख लिपि ब्राम्ही लिपि थी। 

सबसे पुराने अभिलेख हड़प्पा संस्कृति के मुहरों पर मिलते हैं। 

14 वीं सदी में फिरोजशाह तुगलक को अशोक के दो शिलालेख मिले एक मेरठ से और दूसरा हरियाणा के टोपरा से इसको उसने दिल्ली मंगवाया और अपने राज्य के पंडितों से पढ़वाने का प्रयास किया लेकिन किसी ने नहीं पढ़ पाया। फिर इन अभिलेखों को पढ़ने में सफलता 1837 में जेम्स प्रिसेप को मिली। 


अभिलेख के प्रकार 

कुछ अभिलेख राजयदेश के रूप में है जो जनता और अधिकारीयों के लिए सामाजिक धार्मिक या प्रशानिक उद्देश्य हेतु जारी किये जाते थे 

जैसे अशोक के शिलालेख। 

अनुष्ठानिक अभिलेख - इन कोटियों में वो अभिलेख आते हैं जिसको बौद्ध जैन वैषणव शैव संप्रदाय के अनुयायी विभिन्न स्तम्भों और मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण करवाया। 

प्रशस्तियाँ - जिनमें राजाओं महराजाओं के गुणों और कीर्तियों का बखान किया जाता है इनमें उनकी पराजय और दुर्बलताओं को नहीं लिखा जाता। जैसे समुद्रगुप्त की प्रयागप्रशस्ति। 

दानपत्र - इस श्रेणी में राजाओं, राजकुमारों एवं व्यापारी वर्ग द्वारा धर्मार्थ के लिए धन , मवेशी एवं भूमि आदि दान में दी जाती थी। 

राजाओं और भूसामन्तों द्वारा दिए गए भूमिदान के अभिलेख विशेष महत्व के हैं क्योंकि इनसे उस काल की भूव्यवस्था और प्रशासन की जानकारी मिलती है। 





साहित्यिक - हिन्दू धार्मिक साहित्य - वेद, पुराण, रामायण, महाभारत 

विदेशी विवरण 

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